परसाई और आज के अतिकिरांतिकारी

स्वातंत्र्योत्तर भारत की विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक क्यारियों में विसंगति का सड़न, समूची भारत भूमि पर किसी रचनात्मक हरित क्रांति के बीज नही उगा सकी।
परसाई की लेखन - यात्रा ने ढेर सारे पढ़ाव देखे, जिंदगियों की बदसूरती को निहारा, नग्न यथार्थ का अवलोकन किया। चरित्र की सौदेबाजी और उसकी नीलामी सरे बाजार देखी। गांधी और नेहरू के गुर्गों को देश सुधार के नाम पर मुल्क की बोली लगाते देखा, आजादी के मसीहों को फाइव स्टार रेस्तरां में शराब की गोद में मस्ती में बेहोश देखा।
आज के सजग लेखक परसाई ने विसंगतियां, लूट, शोषण, भाई भतीजावाद, राजनीति एवं साहित्यिक अखाड़े और गुटबाजी, शिक्षा के नाम पर अनैतिकता, अराजकता को संस्कृति का एक हिस्सा बनते खुद महसूस किया।'

- राधे मोहन शर्मा

हरिशंकर परसाई, और उनसे भी आधी सदी पहले प्रेमचंद ने एक और काम वह किया जो आज के अतिकिरांतिकारी भाई बंधु नहीं समझ पाते हैं। मसलन दो व्यक्तियों की राज्य अथवा परिवार की अनुमति से परे व्यक्तिगत अधिकारों को सर्वोपरि रखकर साथ आकर अपने प्यार का इज़हार और साथ रहने की आजादी के अधिकारों की वैधता की स्वीकारिता। ये जरूर हो सकता है और पितृसत्तात्मक समाज में होता ही है कि किसी पुरुष को उन सारी तकलीफों और बंदिशों से न गुजरना पड़ता हो या इनका सामना स्त्रियों की अपेक्षा कम करना पड़ता हो जो राज्य, और सूक्ष्म रूप में उनका अपना परिवार उनपर थोपता हो। पर इसी चीज को निरपेक्ष रूप में लेना कौनसी समझदारी है? फिर तो प्यार की पूरी अवधारणा ही खारिज हो जायेगी, जहाँ दुनिया-जहां की रूढ़ियों और पुराने खयालों को पीछे छोड़ दो व्यक्ति साथ आते हैं और जिस हद तक मुमकिन हो समाज से लड़ते भी हैं। दुनियाभर के प्यार के किस्से इसके प्रमाण हैं। पर अगर अतिकिरांतिकारी भाई बंधुओं के तर्क पर चले तो एक ऐसी इकाई की मौजूदगी की जरूरत होगी जो दो व्यक्तियों की सार्वजनिक ज़िंदगियों से लेकर निजी जिंदगियों तक पर लगातार निगरानी बनाए रखे और किसी भी तरह के 'विचलन' पर तुरंत शिकंजा कसे। पर ये काम तो परिवार, धार्मिक संस्थान और राज्य(सीमित अर्थों में बुर्जुआ राज्य भी) निजी संपत्ति के उद्भव से ही करते आ रहे हैं। फिर क्यों नहीं हम श्रद्धा वालकर और आफताब पूनावाला जैसे मामलों में ये नही सुझाते कि उन्हे खुद के फैसले के बजाए अपने घरवालों की सुनकर अंतर धर्मीय विवाह नहीं करना चाहिए था? इसीलिए न कि दो व्यक्तियों के व्यक्तिगत अधिकार किसी भी बाह्य इकाई के हस्तक्षेप से ऊपर होने चाहिए? ताकि व्यक्तियों की व्यक्तिगत आजादी को बरकरार रखा जा सके और निजता के अधिकार की हिफाजत की जा सके। और यही वह चीज़ है जो सदियों पुराने जातिगत अथवा धार्मिक पार्थक्यों और आधार को कमजोर बनाने और तोड़ने का भी हथियार बनती है। पर जूता छोटा पड़ने पर आदमी अपना नया जूता लेने के बजाए अपना पैर काटने लगे तो ऐसेे निष्कर्षों पर पहुंचना स्वाभाविक ही हो जाता है।

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